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मोहर्रम का पैगाम है इंसाफ, सच्चाई और जुल्म के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना।

फुरकान अंसारी।
हरिद्वार,25/06/2026। इस्लामी इतिहास में मोहर्रम का महीना त्याग, बलिदान, सच्चाई और इंसाफ की मिसाल के रूप में याद किया जाता है। कर्बला की धरती पर 10 मोहर्रम, 61 हिजरी को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने सत्य, न्याय और दीन-ए-इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी जानों की कुर्बानी देकर पूरी इंसानियत को अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया।
इतिहास के अनुसार, कर्बला के तपते रेगिस्तान में हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ डटे रहे, जिनमें बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं भी शामिल थीं। दूसरी ओर सत्ता और ताकत के बल पर उन्हें झुकाने की कोशिश की गई, लेकिन इमाम हुसैन ने अन्याय और अत्याचार के सामने सिर झुकाने के बजाय सत्य और सिद्धांतों की राह को चुना।
तीन दिनों तक भूख और प्यास की कठिन परीक्षाओं का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और अपनी तथा अपने परिवार की कुर्बानी देकर यह साबित कर दिया कि सत्य और न्याय की जीत हमेशा कायम रहती है। यही कारण है कि कर्बला की यह घटना आज भी दुनिया भर में इंसाफ, मानवता और अत्याचार के विरोध के प्रतीक के रूप में याद की जाती है।
मोहर्रम का पर्व केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि जुल्म और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध तथा इंसानियत, सब्र और कुर्बानी का संदेश देने वाला ऐतिहासिक अध्याय भी है। यही वजह है कि विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग भी कर्बला के शहीदों की कुर्बानी को सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करते हैं।
रोज़-ए-आशूरा के नाम से प्रसिद्ध 10 मोहर्रम के दिन दुनिया भर में लोग हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद कर उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश करते हैं। वर्ष 2026 में 10 मोहर्रम का दिन 26 जून को मनाया जा रहा है, जिस अवसर पर श्रद्धालु और अकीदतमंद कर्बला के शहीदों को सलाम पेश करते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं।
कर्बला की इस महान कुर्बानी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि सत्ता और ताकत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः जीत सत्य, इंसाफ और मानवता की ही होती है। (हाफिज सान्वर)

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